परासरण , विसरण क्या है

परासरण

1 . परासरण  :- 

विलायक  का  कम  सान्द्रता  के विलयन  से  अधिक  सान्द्रता  के  विलयन  की  ओर  अर्द्धपारगम्य  झिल्ली  में  से  होकर  स्वतः  प्रवाह  करते  हैं  ,  परासरण  कहलाता  है  ।

विसरण :-

वह  क्रियाविधि  जिसमें   विलेय के  अणु  या  कण  विलयन  में  जाकर  उसके  सभी  भागों  की  सान्द्रता  को  समान  कर  देते  हैं  ,  विसरण  कहलाता  है  ।

परासरण क्रिया : १परासरण क्रिया १
अण्डे के दो खोल या आवरण होते हैं । बाह्य खोल कैल्सियम कार्बोनेट का बना होता है तथा भीतरी खोल  एक पारदर्शक अर्द्ध-पारगम्य झिल्ली होती है । अण्डे को तनु हाइड्रोक्लोरिक अम्ल ( HCl) में डालने पर उसका बाह्य खोल पृथक् हो जाता है भीतरी खोल प्रभावित नहीं होता है । बाह्य खोल को  उतार कर एक अण्डे को आसुत जल में  तथा दूसरे को नमक  (NaCl) के संतृप्त विलयन में कुछ घण्टों के लिए रख देने पर आसुत जल में रखा अण्डा कुछ समय के पश्चात फूल जाता है । क्योंकि अण्डे का भीतरी सान्द्रण अधिक होता है तथा बाहर शुद्ध विलायक होता है , अत: जल के अणु अण्डे के भीतर प्रवेश करते हैं तथा अण्डा फूल जाता है ।

परासरण क्रिया : २
परासरण क्रिया २
सोडियम क्लोराइड (नमक) के संतृप्त विलयन में रखा अण्डा कुछ समय के पश्चात सिकुड जाता है क्योंकि अण्डे के बाहर सान्द्रता अधिक होती है । परासरण की क्रिया में विलायक के अणु या कम कम सान्द्रता वाले विलयन की ओर से अधिक सान्द्रता वाले विलयन की ओर स्वत: प्रवाह करते हैं । अत: जल के अण्डे के भीतर से बाहर की ओर प्रवाहित हो जाते हैं, इस कारण अण्डे के आयतन में कमी हो जाती है और अण्डा सिकुड जाता है ।


परासरण  तथा  विसरण  में  अन्तर  :-

परासरण विसरण

(1)  परासरण  में  अर्द्धपारगम्य  झिल्ली  का  होना  आवश्यक  होता  है  ।  जबकि  विसरण  में  किसी  भी  प्रकार  की  झिल्ली  की  आवश्कता  नहीं  होती  है  ।

(2)  परासरण  में  कणों  का  प्रवाह  केवल  एक  दिशा  में  होता  है  ,  अर्थात्  केवल  विलायक के  कण  गति  करते  हैं  ,  जबकि  विसरण  में  विलायक  और  विलेय  दोनों  कण  विपरीत  दिशाओं  में  गति  करते  हैं  ।

(3)  परासरण  में  विलायक  के  कण  कम  सान्द्रता  वाले  विलयन   से  अधिक  सान्द्रता  वाले  विलयन  की  ओर प्रवाहित होते  हैँ  ,  जबकि  विसरण  में  कणों  का  प्रवाह  अधिक   सान्द्रता  से  कम  सान्द्रता  की  ओर  होता  है  ।

परासरण  दाब  क्या  है  ?

परासरण  दाब  ,  उस  द्रव  स्थैतिक  दाब  के  बराबर  होता  है  ,  जो  विलयन  से  अर्द्ध-पारगम्य  झिल्ली  द्वारा  पृथक  करने  पर  उतपन्न  होता  है  ।

परासरण दाब मापने की विधि :-

बर्कले तथा हार्टले की विधि -बर्कले तथा हार्टले की विधि

बर्कले तथा हार्टले ने सन् 1909 में परासरण दाब ज्ञात किया था । इस विधि में एक खोखला बेलन लेकर उसके एक सिरे पर केशनली तथा दूसरे सिरे पर एक थिसिल फनल लगाकर उसमें केशनली के निशान तक शुद्ध विलायक भर देते हैं । इसके पश्चात् इस बेलन के चारों ओर जाली के बीच फैरीसायनाइड की झिल्ली लगा देते हैं । इसके पश्चात् इसके ऊपर एक पिस्टन लगा हुआ दूसरा बड़ा खोखला बेलन लगा देते हैं तथा इसमें विलयन भर देते हैं । इस बेलन में पिस्टन के साथ इक दाबमापी यंत्र भी लगा होता है तथा परासरण की क्रिया में शुद्ध विलायक के कण विलयन की ओर गति करने लगते हैं । जिस कारम केशनली का तल नीचे गिरने लगता है । इस तल को स्थिर रखने के लिये अर्थात् परासरम की क्रिया को रोकने के लिये पिस्टन को अतिर्क्त दाव की आवश्यकता होती है । पिसटन पर लगाये गये अतिरिक्त दाब और दाबमापी की सहायता से नोट कर लेते हैं । इस दाब को परासरण दाब कहते हैं ।

बर्कले - हार्टले विधि के लाभ :-

(1) इस विधि में विलयन की सान्द्रता नहीं बदलती जिससे परिणाम सही आता है ।
(2) इस विधि द्वारा परासरण दाब ज्ञात करने में अधिक समय नहीं लगता है ।
(3) इस विधि में अर्द्ध पारगम्य झिल्ली पर अधिक दाब नहीं पड़ता है जिससे यह फटती नहीं है ।

राउल्ट  नियम  ( Raoul't Law )  क्या  है  ?

सन्  1887  में " राउल्ट (Roult's) "  नाम  के  Scienctist  ने  तनु  विलयन  के  वाष्प  दाब  को  समझाने  के  लिए  एक  नियम  बनाया  ,  जिसे  राउल्ट  नियम  का  नाम दिया गया , इस नियम  के  अनुसार  -

"  किसी  विलायक ( solvent ) में  कोई  अवाष्पशील  विलेय ( solute ) मिलाने  पर  उसके  वाष्प  दाब  में  जो  आपेक्षित  अवनमन  होता  है  ,  वह  विलेय  के  मोलर  प्रभाज  के  बराबर  होता  है  ।  यह  राउल्ट  का  नियम  कहलाता  है  । "

 माना  किसी  विलयन  में  विलेय  के  मोलों  की  संख्या   ( n )  तथा  विलायक  के  मोलों  की  संख्या  ( N )  है  और  यदि  शुद्ध  विलायक  का  वाष्प  दाब  ( P )  व  विलयन  का  वाष्प  दाब  ( Ps )  हो  तब  ,  राउल्ट  के  नियमानुसार  -

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जहाँ

P - Ps  =  बाष्प  दाब  का  अवनमन

P  =  शुद्ध  विलायक  का  वाष्प  दाब

n  =  विलेय  के  मोलों  की  संख्या

N  =  विलायक  के  मोलों  की  संख्या



राउल्ट  नियम  की  सीमायें  :-

राउल्ट  नियम  की  सीमायें  निम्न  हैं -
(1)  राउल्ट  नियम  केवल  अवाष्पशील  विलेय  पदार्थ  से  वने  विलयनो  पर  लागू  होता  है  ।

(2)  राउल्ट  का  नियम  वैद्युत  अपघट्यों  के  द्रारा  बने  विलयनों  पर  लागू  नहीं  होता  है  ,  क्योंकि  किसी  पदार्थ  का  वियोजन  होता  है  ,  तब  उसके  अणुओं  की  संख्या  बढ़  जाती  है  ,  और  इस  कारण  वाष्प  दाब  का  अबनमन  भी  बढ़  जाता  है ।

(3)  राउल्ट  नियम  केवल  अति  तनु  विलयनों  के  लिए  लागू  होता  है  ।

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परासरण , विसरण क्या है परासरण , विसरण क्या है Reviewed by suresh kumar gautam on March 23, 2017 Rating: 5

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